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[Mission 2022] INSIGHTS करेंट अफेयर्स+ पीआईबी नोट्स [ DAILY CURRENT AFFAIRS + PIB Summary in HINDI ] 09 August 2022

विषयसूची

सामान्य अध्ययन-I

  1. ‘भारत छोड़ो आंदोलन’ का अनुस्मरण

सामान्य अध्ययन-II

  1. भारत, लोकतंत्र और वादा किया हुआ गणतंत्र
  2. राष्ट्रीय जनजातीय स्वास्थ्य मिशन
  3. ताइवान के समक्ष आने वाला युद्ध

सामान्य अध्ययन-III

  1. भारत में जल प्रबंधन

मुख्य परीक्षा संवर्धन हेतु पाठ्य सामग्री (निबंध/नैतिकता)

  1. तटीय कटाव को कम करने के लिए टेट्रापॉड आधारित समुद्री दीवार

 

प्रारम्भिक परीक्षा हेतु तथ्य

  1. पोर्टुलाका ओलेरासिया
  2. संस्कृति मंत्रालय और गूगल की ‘भारत की उड़ान’ पहल
  3. परवाज़ मार्केट लिंकेज योजना
  4. इंडियन वर्चुअल हर्बेरियम
  5. अविवाहित महिलाएं गर्भपात सेवाओं का लाभ उठा सकती हैं: सुप्रीम कोर्ट
  6. विश्व आदिवासी दिवस 2022
  7. ग्रेट बैरियर रीफ

 


सामान्य अध्ययनI


 

विषय: स्वतंत्रता संग्राम- इसके विभिन्न चरण और देश के विभिन्न भागों से इसमें अपना योगदान देने वाले महत्त्वपूर्ण व्यक्ति/उनका योगदान।

भारत छोड़ो आंदोलन’ का अनुस्मरण

संदर्भ:

9 अगस्त 1942 को भारतीय स्वतंत्रता संग्राम का सबसे बड़ा जन आंदोलन यानी ‘भारत छोड़ो आंदोलन’ की शुरूआत हुई थी। इस वर्ष ‘भारत छोड़ो आंदोलन’ (Quit India Movement) के 80 वर्ष पूरे हो गए हैं।

(नोट: भारत छोड़ो आंदोलन प्रीलिम्स और मुख्य परीक्षा दोनों, विशेष रूप से स्वतंत्रता के लिए भारतीय राष्ट्रीय संघर्ष, के सबसे महत्वपूर्ण भागों में से एक है। इसकी शुरुआत, सफलता और असफलता के प्रमुख कारणों को याद करने की कोशिश करें।)

कारण:

  • देश के नेताओं के साथ बिना किसी परामर्श के ‘द्वितीय विश्व युद्ध’ में भारत को शामिल किया जाना।
  • क्रिप्स मिशन की विफलता: अंग्रेजों ने भारत का सहयोग हासिल करने के लिए ‘सर स्टैफोर्ड क्रिप्स’ को भारत भेजा था। अंग्रेजों का यह विफल हो गया क्योंकि, ‘क्रिप्स मिशन’ ने भारत को पूर्ण स्वतंत्रता के बजाय देश का ‘विभाजन’ करने और भारत को ‘डोमिनियन स्टेटस’ देने का प्रस्ताव किया था।
  • आवश्यक वस्तुओं की कमी: देश में आवश्यक वस्तुओं की अत्यधिक कमी और नमक, चावल आदि की बढ़ती कीमतों, और बंगाल तथा उड़ीसा में नावों को अंग्रेजों द्वारा अपने कब्जे में लिए जाने के कारण व्यापक असंतोष व्यापत था।
  • ब्रिटिश विरोधी भावना की व्यापकता: देश में ब्रिटिश विरोधी भावनाएँ व्यापक रूप से फ़ैल चुकी थीं, और जनता ब्रिटिश सरकार से पूर्ण स्वतंत्रता की मांग कर रही थी।
  • कई छोटे आंदोलनों का केंद्रीकरण।

भारत छोड़ो आंदोलन के चरण:

  • पहला चरण: आंदोलन के पहले चरण में कोई हिंसा नहीं हुई। इसकी शुरुआत सविनय अवज्ञा, बहिष्कार और हड़ताल से हुई जिसे ब्रिटिश सरकार ने तुरंत दबा दिया। गांधीजी सहित कांग्रेस कमेटी के लगभग सभी सदस्यों को गिरफ्तार कर लिया गया और बिना किसी मुकदमे के 1945 तक जेल में रखा गया।
  • दूसरा चरण: अपने दूसरे चरण में, आंदोलन ग्रामीण इलाकों में स्थानांतरित हो गया। आंदोलन के दूसरे चरण ने हिंसक और आक्रामक मोड़ ले लिया। जो भी इमारत या कार्यालय जो औपनिवेशिक सत्ता के प्रतीक थे, उन पर हमला किया गया और उनको तोडा-फोड़ा गया। संचार प्रणालियों, रेलवे स्टेशनों और पटरियों, टेलीग्राफ खंबो और तारों को भी निशाना बनाया गया।
  • तीसरा और अंतिम चरण: आंदोलन के अंतिम चरण में, देश के अलग-अलग हिस्सों, जैसेकि बलिया, सतारा, तमलुक, आदि में कई स्वतंत्र राष्ट्रीय या समानांतर सरकारों का गठन हुआ।

भारत छोड़ो आंदोलन की सफलता

  • महिला सशक्तिकरण: इस आंदोलन में देश की महिलाओं की सक्रिय भागीदारी रही। अरुणा आसिफ अली ने गोवालिया टैंक मैदान पर राष्ट्रीय ध्वज फहराया; दूसरी ओर, उषा मेहता ने आंदोलन के बारे में जागरूकता फैलाने के लिए भूमिगत रेडियो स्टेशन स्थापित करने में मदद की।
  • भावी नेताओं का उदय: इस आंदोलन ने भविष्य के कुछ प्रमुख नेताओं जैसे भीखू पटनायक, अरुणा आसिफ अली, राम मनोहर लोहिया, सुचेता कृपलानी, जे.पी. नारायण आदि को भी दिया। ये नेता भूमिगत गतिविधियों के माध्यम से आंदोलन में मदद कर रहे थे।
  • राष्ट्रवाद का उदय: भारत छोड़ो आंदोलन के कारण एकता और भाईचारे की बृहत भावना का उदय हुआ।

भारत छोड़ो आंदोलन की विफलता:

  • अंग्रेजों को रियासतों, ब्रिटिश भारतीय सेना, भारतीय सिविल सेवा, वायसराय परिषद (जिसमें अधिकाँश भारतीय शामिल थे), अखिल भारतीय मुस्लिम लीग, इंडियन इम्पीरियल पुलिस का सहयोग एवं समर्थन प्राप्त था।
  • हिंदू महासभा, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) और मुस्लिम लीग ने भी ‘भारत छोड़ो आंदोलन’ का विरोध किया।

इंस्टा लिंक:

भारत छोड़ो आंदोलन

मेंस लिंक:

भारत छोड़ो आंदोलन, भारत के राष्ट्रीय आंदोलन की लंबी प्रक्रिया में अपने आप में एक क्रांति थी। भारत छोड़ो आंदोलन की प्रकृति पर टिप्पणी कीजिए। (10 अंक)

स्रोत: द इंडियन एक्सप्रेस

 

विषय: विभिन्न क्षेत्रों में विकास के लिए सरकारी नीतियां और हस्तक्षेप

भारत, लोकतंत्र और वादा किया गया गणतंत्र

संदर्भ: भारत जल्द ही अपनी 75वीं वर्षगांठ मनाएगा। इस आर्टिकल में यह आकलन किया गया है कि, भारतीय लोकतंत्र अब तक कितना सफल रहा है।

(नोट: इस आर्टिकल को केवल पढ़ लें। नोट्स बनाने की जरूरत नहीं है।)

भारत को उसकी 75वीं वर्षगांठ पर किस प्रकार आंका जाना चाहिए?

मानव विकास के आधार पर: भारत का आकलन, न केवल आर्थिक विकास के आधार पर, बल्कि इसने  मानव विकास को किस हद तक उन्नत किया है, इस आधार पर किया जाना चाहिए।

वर्तमान में, भले ही भारतीय अर्थव्यवस्था, दुनिया में 5वीं सबसे बड़ी बनने जा रही हो, किंतु भारत, वर्ष 2020 की ‘मानव विकास रिपोर्ट’ में 189 देशों की सूची में 131वें स्थान पर है।

पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने 15 अगस्त 1947 को राष्ट्र के नाम अपने संदेश में कहा था, कि भारत का उद्देश्य:

  • स्वतंत्रता और अवसर लाना;
  • गरीबी, अज्ञानता और बीमारी से लड़ना और समाप्त करना;
  • एक समृद्ध, लोकतांत्रिक और प्रगतिशील राष्ट्र का निर्माण करना, और
  • प्रत्येक पुरुष और महिला के लिए न्याय और जीवन की परिपूर्णता सुनिश्चित सामाजिक, आर्थिक और करने वाली राजनीतिक संस्थाओं का निर्माण करना है।

75वीं वर्षगांठ पर महिलाओं की स्थिति:

लिंग आधारित उच्च असमानता: यह भारत में व्यापक रूप से फ़ैली हुई है; प्रत्येक सामाजिक समूह में महिलाएं अपने पुरुषों से भी बदतर स्थिति में हैं। महिलाएं कम पोषित हैं, कम शिक्षित हैं और शासन की संस्थाओं में उनका प्रतिनिधित्व आबादी के अपने हिस्से से बहुत कम है।

  • शेष विश्व की तुलना में भारत में महिलाओं की श्रम शक्ति में भागीदारी बहुत कम है।
  • सामाजिक प्रतिबंध और आर्थिक अभाव, संयुक्त रूप से समाज में उनकी ‘द्वितीयक स्थिति’ को मजबूत करता है जो उन्हें घर से बाहर काम करने से हतोत्साहित करते हैं।

हालांकि, कुछ प्रगति हुई है- महिला साक्षरता में वृद्धि हुई है, संसदीय चुनाव में, पुरुषों की तुलना में अधिक महिलाओं ने भाग लिया, स्थानीय शासन में उनका प्रतिनिधित्व काफी बढ़ गया है, और ‘मातृत्व मृत्यु दर’ और कन्या भ्रूण हत्या के मामलों में कमी आई है।

75वीं वर्षगांठ पर क्षेत्रीय भेदभाव की स्थिति:

  • चीन के साथ तुलना: चीन, स्वास्थ्य और शिक्षा से संबंधित विकास संकेतकों पर भारत से कहीं बेहतर स्थिति में है। हालांकि, कुछ भारतीय राज्यों ने चीन की तुलना में मानव विकास संकेतकों पर अपेक्षाकृत अच्छा प्रदर्शन किया है।
  • दक्षिण भारत (जैसे, केरल और तमिलनाडु) और भारत के पश्चिमी राज्यों में अधिक विकास हुआ है, क्योंकि इन राज्यों में सामाजिक परिवर्तन अधिक हुआ है।
  • मानव विकास में क्षेत्रीय भेदभाव की अधिकता: उदाहरण के लिए, नीति आयोग द्वारा 2021 में जारी किए गए आंकड़े बताते हैं कि बिहार में बहु-आयामी गरीबी 50% से अधिक है जबकि केरल में यह मात्र 1% से कुछ अधिक है।

निष्कर्ष:

वर्तमान परिदृश्य में जहां व्यक्तियों की ‘अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता’ पर संकट छाया हुआ है, नागरिक स्वतंत्रता दांव पर लगी हुई है और कृषि-क्षेत्र संकट से गुजर रहा है, भारत के लिए सामाजिक परिवर्तन की सुविधा प्रदान करने में सक्षम “सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक” संस्थानों का निर्माण करना आवश्यक है।

इंस्टा लिंक:

लोकतंत्र रिपोर्ट 2022

भारत के लोकतंत्र में डायस्टोपिया (निरंकुशता)

मेंस लिंक:

स्वतंत्रता के बाद से भारत में लोकतंत्र की कार्यप्रणाली का समालोचनात्मक विश्लेषण कीजिए। (15 अंक)

स्रोत: द हिंदू

 

विषय: समाज का कमजोर वर्ग

राष्ट्रीय आदिवासी स्वास्थ्य मिशन शुरू करने की आवश्यकता

संदर्भ: हिंदू संपादकीय

नोट: कुछ महत्वपूर्ण आँकड़ों और 1-2 सिफारिशों पर ध्यान दें।

आदिवासियों से संबंधित मुद्दे (स्वास्थ्य संबंधी):

‘द लैंसेट’ की ‘इंडिजेनस एंड ट्राइबल पीपल्स हेल्थ’ (2016) रिपोर्ट के अनुसार:

  • भारत की जनजातीय आबादी में ‘शिशु मृत्यु दर’ विश्व में पाकिस्तान के बाद सर्वाधिक है।
  • आदिवासी बच्चों में ‘बाल कुपोषण’ 50% अधिक है।
  • भारत की लगभग साढ़े पांच करोड़ जनजातीय आबादी, बिखरी हुई और हाशिए पर पड़े अल्पसंख्यकों के रूप में अधिसूचित क्षेत्रों से बाहर रहती है। यह भारतीय आबादी का सबसे शक्तिहीन समुदाय है।
  • जनजातीय लोगों में, मलेरिया और तपेदिक जैसी बीमारियां, तीन से 11 गुना अधिक पाया जाना आम बात हैं।
  • खराब स्वास्थ्य अवसंरचना: आदिवासी क्षेत्रों में प्राथमिक स्वास्थ्य सुविधाओं की संख्या में 27% से 40% की कमी है, और चिकित्सा डॉक्टरों में 33% से 84% की कमी है।
  • कम भागीदारी: जनजातीय लोगों की स्थानीय या राज्य या राष्ट्रीय स्तर पर अपने लिए स्वास्थ्य देखभाल की रूपरेखा या योजना बनाने तथा इन सुविधाओं के वितरण में शायद ही कोई भागीदारी है।
  • राज्य में अनुसूचित जनजातीय आबादी के प्रतिशत के बराबर ‘जनजातीय उप-योजना’ (Tribal Sub-Plan: TSP) के तहत वित्तीय परिव्यय का सभी राज्यों द्वारा पूरी तरह से उल्लंघन किया गया है।

समाधान:

  • अगले 10 वर्षों में जनजातीय आबादी की स्वास्थ्य और स्वास्थ्य देखभाल की स्थिति को, संबंधित राज्य के औसत के बराबर लाने के लिए एक ‘राष्ट्रीय जनजातीय स्वास्थ्य कार्य योजना’ शुरू की जानी चाहिए।
  • 10 प्राथमिक स्वास्थ्य समस्याओं, स्वास्थ्य देखभाल अंतराल, मानव संसाधन अंतराल और शासन-संबंधी समस्याओं का समाधान किया जाए।
  • अतिरिक्त धन का आवंटन किया जाना चाहिए, ताकि जनजातीय लोगों पर ‘प्रति व्यक्ति सरकारी स्वास्थ्य व्यय’, राष्ट्रीय स्वास्थ्य नीति (2017) के घोषित लक्ष्य, अर्थात ‘प्रति व्यक्ति सकल घरेलू उत्पाद का 2.5%’ के बराबर हो सके।
  • मिशन मोड कार्यान्वयन: स्वास्थ्य मंत्री और बड़ी जनजातीय आबादी वाले 10 राज्यों को साथ मिलकर पहल करनी चाहिए।

निष्कर्ष:

भारत में ‘जनजातीय स्वास्थ्य देखभाल प्रणाली’ (Tribal Healthcare System) बीमार है, और जनजातीय लोगों को अधिक ठोस समाधान की आवश्यकता है। हमें प्रतीकात्मक संकेतों से वास्तविक वादों की ओर, वादों से एक व्यापक कार्य योजना और एक कार्य योजना से एक स्वस्थ आदिवासी लोगों के लक्ष्य को साकार करने की ओर बढ़ने की आवश्यकता है। यदि इस पर हकीकत में काम किया जाए तो, ‘जनजातीय स्वास्थ्य मिशन’ 11 करोड़ जनजातीय लोगों के लिए एक ‘शांतिपूर्ण स्वास्थ्य क्रांति’ का मार्ग बन सकता है।

इंस्टा लिंक

एससी/एसटी से संबंधित मुद्दे

मेंस लिंक:

जनजातीय समूह- सामाजिक, आर्थिक और शैक्षिक विकास के विभिन्न चरणों में हैं; इसलिए ‘एक नाप, सबके लिए फिट’ (one size fits all) दृष्टिकोण काम नहीं करेगा। भारत में जनजातीय समुदायों के विकास के उद्देश्य से विभिन्न नीतियों का मूल्यांकन कीजिए। (15 अंक)

स्रोत: द हिंदू

 

विषय: द्विपक्षीय, क्षेत्रीय और वैश्विक समूह और भारत से संबंधित और/अथवा भारत के हितों को प्रभावित करने वाले करार।

ताइवान के समक्ष आने वाला युद्ध

संदर्भ: अमेरिकी हाउस स्पीकर ‘नैंसी पेलोसी’ की हालिया ‘ताइवान’ यात्रा को देखते हुए, इस क्षेत्र में ‘भू-राजनीति’ तेज हो गई है।

(नोट: इस वर्ष मुख्य परीक्षा की तैयारी करने वाले अभ्यर्थी, संबंधित विषयों –  वर्तमान संकट (पेपर 2 के लिए), नया शीत युद्ध (पेपर 2) और 1949 की चीनी क्रांति (विश्व इतिहास के लिए)- पर एक अलग से नोट्स बना सकते हैं।)

संबधित विवाद की पृष्ठभूमि:

ताइवान, चीन के पूर्वी तट से दूर एक छोटा सा द्वीप है। सन् 1949 में चीन में दो दशक तक चले गृहयुद्ध में कम्युनिस्टों की जीत के बाद, ताइवान की ‘कुओमिन्तांग सरकार’ (Kuomintang Government) चीनी रिपब्लिकन पीछे हट गए थे- और तब से ताइवान, ‘चीन गणराज्य’ (Republic of China – RoC) के रूप में बना हुआ है।

  • पीपुल्स रिपब्लिक ऑफ चाइना (PRC ) अर्थात चीन का कहना है, कि “दुनिया में केवल एक ही ‘चीन’ है” और “ताइवान, उस चीन का एक अविभाज्य हिस्सा है”।
  • हालाँकि, ‘स्व-शासित ताइवान’ खुद को एक स्वतंत्र राष्ट्र से कम नहीं मनाता है, और इसके नेताओं ने ‘चीन के ताइवान को अपने देश में वापस मिलाने के लक्ष्य’ के खिलाफ अपनी संप्रभुता की रक्षा करने की कसम खाई है। वर्तमान में, संभावित चीनी आक्रमण के खिलाफ अपनी रक्षा के लिए ताइवान पूरी तरह से अमेरिका पर निर्भर है।

चीन, ताइवान को फिर से अपने साथ मिलाना क्यों चाहता है?

  • पश्चिमी शक्तियों द्वारा दो शताब्दियों तक किए गए कथित ‘अपमान’ से उबरने के लिए।
  • लगभग सौ साल पहले शुरू हुए ‘गृहयुद्ध’ को खत्म करने के लिए।
  • चीन का मानना ​​है कि अगर वह ताइवान को फिर से हासिल कर लेता है तो वह ‘वैश्विक शक्ति’ के रूप में अपना उचित स्थान फिर से हासिल कर लेगा।

चीनी सिद्धांत का हालिया उद्विकास:

  1. पहला कार्य: चीन ने ‘डेंग जियाओपिंग’ (Deng Xiaoping) की ‘छिपाओ और ठहरे रहो’ (Hide and Bide) की रणनीति और ‘हू जिंताओ’ के ‘शांतिपूर्ण उदय’ (Peaceful Rise) को अपनाया है। इस प्रकार, चीन जब तक अगले चरण में जाने के लिए पर्याप्त शक्तिशाली नही हो गया, तब तक वह शांत और परदे के पीछे चीप रहा।
  2. दूसरा कार्य: 2010 तक चीन विश्व शक्तियों को चुनौती देने के लिए पर्याप्त शक्तिशाली बन गया, और उसने अपनी शर्तों पर विवादित क्षेत्रों, भूमि और समुद्र दोनों पर बलपूर्वक नियंत्रण करना शुरू कर दिया।
  3. उदहारण के लिए- चीन, दक्षिण चीन सागर में रयूकू, स्प्रैटली, पारसेल द्वीपसमूहों, नाइन-डैश लाइन्स, और भूटान, नेपाल और भारत के साथ हिमालयी सीमाओं के साथ यथास्थिति में बदलाव करने की कोशिश कर रहा है।
  4. तीसरा कार्य: चीन से वर्ष 2020 में हांगकांग को वस्तुतः अपने अधिकार में फिर से ले लिया। चीन ने “एक देश, दो व्यवस्था” के तहत इसकी सीमित स्वायत्तता को नष्ट कर दिया। ‘मकाओ’ पहले से ही चीन ने अपने देश में मिला लिया था। इस प्रकार, चीन का एकमात्र शेष लक्ष्य ‘ताइवान’ है।
  5. चौथा कार्य: यह काम तब होगा, जब चीन ने ‘ताइवान’ को फिर से अपनी मुख्य भूमि में शामिल कर लेगा। इसके बाद यह, दुनिया की प्रमुख शक्ति के रूप में अमेरिका को चुनौती देगा और उसे पीछे छोड़ देगा।

चीनी नीति से जुड़े मुद्दे:

  • चीन की आंतरिक कमजोरी: चीन एक सदी के गृहयुद्ध और क्रांतिकारी ज्यादतियों से पीड़ित रहा है। उदाहरण के लिए, निजी क्षेत्र पर हालिया हमलों, तकनीकी अर्थव्यवस्था, वर्तमान जीरो-कोविड नीति आदि ने चीनी अर्थव्यवस्था को नुकसान पहुंचाया है।
  • हांगकांग के नागरिक, अभी भी चीनी अधिग्रहण का विरोध कर रहे हैं।
  • बाहरी प्रतिरोध: भारत के प्रतिरोध ने हिमालय में चीनी महत्वाकांक्षा के लिए कठिनाइयों को बढ़ा दिया है। QUAD और AUKUS जैसे नए समूहों का उदय हो रहा है। नैंसी पेलोसी की यात्रा वाशिंगटन में एक द्विदलीय सहमति की अभिव्यक्ति है, जिसको बीजिंग द्वारा चुनौती दी जानी चाहिए।
  • विश्व युद्ध/परमाणु युद्ध का खतरा: संयुक्त राष्ट्र प्रमुख पहले ही चेतावनी दे चुके हैं कि हाल की भू-राजनीतिक घटनाओं के कारण परमाणु युद्ध हो सकते हैं।

भारत-ताइवान संबंध (Indo- Taiwan relations):

  • यद्यपि भारत-ताइवान के मध्य औपचारिक राजनयिक संबंध नहीं हैं, फिर भी ताइवान और भारत विभिन्न क्षेत्रों में परस्पर सहयोग कर रहे हैं।
  • भारत ने वर्ष 2010 से चीन की ‘वन चाइना’ नीति का समर्थन करने से इनकार कर दिया है।

भारत को क्या करना चाहिए?

  • पक्ष लेना चाहिए: स्वर्गीय के. सुब्रमण्यम ने स्पष्ट रूप से कहा कि चीन के साथ अपने मुकाबले में, भारत पश्चिमी देशों के पक्ष में रहना बेहतर है, क्योंकि चीन की आकांक्षाओं और इसका अपनी महत्वाकांक्षाओं का पीछा करने का तरीका गलत है।
  • चीन को चुनौती देने के लिए ताइवान का इस्तेमाल किया जाना चाहिए। ‘ताइवान’, भारत के लिए एक प्रमुख रणनीतिक चिंता का विषय नहीं है। चूंकि, क्योंकि यह बीजिंग की ताकत का उपभोग करने और वैश्विक शक्ति के लिए चीन के खेल में देरी करने में सक्षम है, अतः ‘ताइवान’ द्वारा चीन को उल्जह्ये रखना भारत के हित में है। इसलिए, कुछ हद तक, हमारे हित अमेरिका, जापान, ऑस्ट्रेलिया और ताइवान के लोगों के हितों के साथ मिलते हैं।
  • सामग्री और नैतिक समर्थन: ‘क्वाड पार्टनर’ ताइवान को भौतिक समर्थन दे सकते हैं, और ताइवान के लिए भारत का नैतिक समर्थन बहुत महत्वपूर्ण हो सकता है।

निष्कर्ष:

अंतर्राष्ट्रीय नेताओं को अच्छी कूटनीति अपनानी चाहिए, जिसमें ‘समय को आगे खीचते रहना’ और शांति बनाए रखना शामिल है। जरूरत इस बात की है कि देशों को एक ऐसे समाधान पर आने का प्रयास करना चाहिए जो न कि केवल कथित राष्ट्रीय गौरव का बल्कि लोगों की इच्छाओं का ध्यान रखे।

इंस्टा लिंक:

भारत-ताइवान संबंध

मेंस लिंक:

‘वन चाइना पॉलिसी’ क्या है? इस बात की जांच करें कि ‘ताइवान मुद्दा’ अमेरिका और चीन के बीच भू-राजनीतिक संघर्षों के अस्थिर कॉकटेल का उदाहरण किस प्रकार है। (250 शब्द)

स्रोत: लाइव मिंट

 


सामान्य अध्ययनIII


 

विषय: संरक्षण, पर्यावरण प्रदूषण और क्षरण, पर्यावरण प्रभाव का आकलन।

 भारत में जल प्रबंधन

संदर्भ: बिजनेस स्टैंडर्ड में प्रकाशित एक आर्टिकल पर आधारित।

नोट: यूपीएससी परीक्षा में ‘पानी’ हमेशा एक बहुत ही महत्वपूर्ण विषय है। पानी के विभिन्न आयामों -इसका प्रबंधन, पानी में लिंग विभाजन, भूजल, सतही जल, नदी को आपस में जोड़ना, जल संरक्षण के उपाय आदि पर एक नोट तैयार कर लें। इस लेख से कुछ बिंदु नोट किए जा सकते हैं।

जल:

  • भारत के पास विश्व के कुल जल संसाधन का मात्र 4% है, जबकि भारत की आबादी विश्व की कुल आबादी का 1% है।
  • जल (Water), भारत में ‘स्वास्थ्य सुरक्षा और आर्थिक विकास’ का एक प्रमुख निर्धारक है।
  • भारत में 50% से अधिक कृषि अभी भी वर्षा पर निर्भर है।

भारत में ‘जल प्रबंधन का उद्विकास’:

  • 1980 के दशक तक: ‘जल प्रबंधन’ (Water management) केवल सिंचाई परियोजनाओं के मुद्दे तक ही सीमित था। अतः बड़े बांधों और नहरों के निर्माण पर ध्यान केंद्रित किया गया। हालाँकि, 1980 के दशक के उत्तरार्ध में पड़े सूखे ने यह साबित कर दिया कि ये बड़ी परियोजनाएँ अपर्याप्त थीं।
  • 1980 के दशक के बाद की अवधि: विकेंद्रीकरण पर ध्यान केंद्रित किया गया। उदाहरण के लिए, वर्षा जल संचयन (तालाबों का निर्माण, टैंक खोदना, और धाराओं पर चेक-डैम स्थापित करना)। “वर्षा विकेंद्रीकृत है, अतः पानी की मांग भी विकेंद्रीकृत है। इसलिए, बारिश कब और कहां गिरती है, इसका सदुपयोग करें” जैसे नारे दिए गए।
  • 2000 के दशक के मध्य से: वर्षा जल संचयन पर ध्यान केंद्रित किया गया और ‘भूजल’ को महत्व दिया गया। और, इसलिए मनरेगा को ‘भूजल में वृद्धि और वर्षा जल संचयन’ के प्रयासों से जोड़ा गया।
  • 2010 के बाद: शहरी सूखे की एक श्रृंखला ने वितरण की अड़चन और सीवेज के पानी के पुन: उपयोग और उपचार की कमी से संबंधित मुद्दों पर ध्यान केंद्रित किया। इसलिए, पाइप से पीने के पानी (जल जीवन मिशन) और इस्तेमाल किए गए पानी के उपचार (स्वच्छ भारत मिशन) पर ध्यान केंद्रित किया गया।

आवश्यकता:

  • ऑन-साइट स्थानीय उपचार प्रणालियों की पुनर्रचना: इसका अर्थ है कि प्रत्येक घर से एकत्र किया जाने वाला कचरा, उसी क्षेत्र में परिवहन और उपचार किया जाए।
  • पुन: उपयोग पर ध्यान देना: शहरी-औद्योगिक अपशिष्ट जल और सीवेज का उपचार, पुनर्चक्रण और पुन: उपयोग किया जाना चाहिए। यदि इसका पुन: उपयोग के लिए उपचार किया जाता है, तो यह हमारी नदियों के पानी के नुकसान और प्रदूषण को रोकेगा। उदाहरण के लिए, सिंगापुर में, लगभग सभी पानी का शोधन और पुन: उपयोग किया जाता है।
  • न्यूनतम अपव्यय: उदाहरण के लिए, जल-कुशल सिंचाई (‘प्रति बूंद अधिक फसल’), घरेलू उपकरणों, और हमारे आहार में परिवर्तन में निवेश करना।
  • पारंपरिक जल भंडारण संरचनाओं पर ध्यान देना: जैसे, बावली (राजस्थान, गुजरात), टैंक, तालाब (तालाब), चेक डैम (मेवाड़ क्षेत्र में बंध कहा जाता है), आदि।
  • पश्चिमी राजस्थान की पार प्रणाली (Paar system): यह एक सामूहिक स्थान होता है जहाँ वर्षा का पानी आगर (जलग्रहण) से बह कर आता है और इस प्रक्रिया में रेतीली मिट्टी में समा जाता है।
  • बुंदेलखंड क्षेत्र की पाट प्रणाली (Pat System): इस प्रणाली को इलाके की ख़ासियत के अनुसार तैयार किया गया था, ताकि तेजी से बहने वाली पहाड़ी धाराओं से बहने वाले ‘पानी’ को पाट नामक सिंचाई चैनलों की ओर मोड़ा जा सके।
  • स्पंज शहर: उपचारित सीवेज और अपशिष्ट जल को शहरों में भूजल को, रिचार्ज करने और हमें जल-सुरक्षित बनाने के लिए स्पंज (आर्द्रभूमि, तालाब, वर्षा उद्यान) की ओर मोड़ना चाहिए। चीन का ‘बीजिंग’ शहर ‘स्पंज शहर’ का एक उदहारण है।

‘जल जीवन मिशन’ की सफलता की कहानी:

  • ठाणे (महाराष्ट्र) के औद्योगिक क्षेत्र में स्थित ‘पिंपलघर-रंजनोली गांव’ के 5,644 निवासियों में से प्रत्येक को प्रतिदिन 55 लीटर पानी तक पहुंचना पड़ता है। ग्रामीणों ने जल जीवन मिशन (JJM) के तहत धन का उपयोग यह सुनिश्चित करने के लिए किया कि गांव के सभी 842 परिवारों को नल के पानी का कनेक्शन मिले। गांव ने प्रभावी ढंग से सुनिश्चित किया है कि यहाँ के निवासी नल के पानी के लिए ‘उपयोगकर्ता शुल्क’ का भुगतान करें।
  • जल जीवन मिशन (JJM) को लागू करने में महाराष्ट्र देश के अग्रणी राज्यों में से एक है।महाराष्ट्र में 71 प्रतिशत घरों में नल कनेक्शन है; जबकि राष्ट्रीय औसत 52 प्रतिशत से भी कम है।

इंस्टा लिंक:

जल प्रबंधन को जल-सामाजिक दृष्टिकोण की आवश्यकता है

मेंस लिंक:

जलवायु परिवर्तन के कारण जल और उसके प्रबंधन पर नई चुनौतियों और रणनीतियों का परीक्षण करें। (15 अंक)

 


मुख्य परीक्षा संवर्धन हेतु पाठ्य सामग्री (निबंध/नैतिकता)


तटीय कटाव को कम करने के लिए टेट्रापॉड आधारित समुद्री दीवार

संदर्भ: सरकार की तटीय संरक्षण परियोजना के तहत, केरल के एर्नाकुलम जिले में एक टेट्रापॉड-आधारित समुद्री दीवार (Tetrapod-Based Seawall) बनायी गई है।

  • लाभ: चेलनम (Chellanam) की पारंपरिक समुद्री दीवार, स्थलीय क्षेत्र में समुद्र के प्रवेश को रोकने में विफल रही, जिसके परिणामस्वरूप बड़े पैमाने पर बर्बादी और विनाश हुआ। अब, टेट्रापोड-आधारित समुद्री दीवार के कारण, समुद्र के कटाव के लिए सबसे अधिक संवेदनशील प्रखंड कुल मिलाकर सुरक्षित हैं।
  • अन्य समाधान: समुद्र तट पोषण (तटवर्ती समुद्र की गहराई को कम करना) भी एक स्थायी समाधान प्रदान करता है।

 

 

 


प्रारम्भिक परीक्षा हेतु तथ्य


पोर्टुलाका ओलेरासिया

संदर्भ: वैज्ञानिकों ने एक नए प्रकार के प्रकाश संश्लेषण का उत्पादन करने के लिए दो चयापचय मार्गों (metabolic pathways) को एकीकृत किया है जो ‘खरपतवार’ को अत्यधिक उत्पादक रहते हुए भी सूखे का सामना करने में सक्षम बनाते हैं।

  • एक आम खरपतवार और गूदेदार – पोर्तुलाका ओलेरासिया (Portulaca oleracea), जिसे आमतौर पर ‘पर्सलेन’ (Purslane) के नाम से जाना जाता है, जलवायु परिवर्तन से घिरी दुनिया में ‘सूखा-सहिष्णु फसलों’ के उत्पादन के बारे में महत्वपूर्ण सुराग प्रदान करता है।
  • ‘पर्सलेन’ में विकासवादी अनुकूलन हैं जो इसे अत्यधिक उत्पादक और सूखा सहिष्णु, दोनों होने में मदद करते हैं, जोकि एक पौधे के लिए एक असंभव संयोजन है।
  • अन्य उपयोग: पोर्टुलाका ओलेरासिया का उपयोग कई देशों में एक ‘लोक औषधि’ के रूप में किया जाता है, यह एक ज्वरनाशक, एंटीसेप्टिक और वर्मीफ्यूज के रूप में कार्य करता है।

 

संस्कृति मंत्रालय और गूगल की भारत की उड़ानपहल

  • संस्कृति मंत्रालय और गूगल ने पिछले 75 वर्षों की भारत की अटूट, अमर भावना और इसकी उपलब्धियों का जश्न मनाने के लिए ‘भारत की उड़ान’ पहल की शुरुआत की है।
  • यह आयोजन संस्कृति मंत्रालय और गूगल के बीच दशक भर की जारी साझेदारी का हिस्सा है।
  • इसका उद्देश्य अपने समृद्ध अभिलेखागार और कलात्मक चित्रों के माध्यम से नागरिकों को भारत की समृद्ध संस्कृति और विरासत में ले जाना है।

परवाज़ मार्केट लिंकेज योजना

संदर्भ: हाल ही में, जम्मू और कश्मीर सरकार ने “परवाज़ मार्केट लिंकेज स्कीम” (PARVAZ Market Linkage Scheme) शुरू की है। यह एक अभिनव मार्केट लिंकेज योजना है, जिसमें पूरे जम्मू और कश्मीर के किसानों की आर्थिक स्थिति में उत्थान करने की जबरदस्त क्षमता है।

योजना के तहत, सरकार ‘खराब होने वाले’ फलों (Perishable Fruits) को ‘एयर कार्गो’ के माध्यम से ले जाने के लिए ‘माल ढुलाई शुल्क’ पर 25% की सब्सिडी प्रदान की जाएगी। यह सब्सिडी, किसानों को ‘प्रत्यक्ष लाभ हस्तांतरण’ के माध्यम से सब्सिडी प्रदान की जाएगी।

 

इंडियन वर्चुअल हर्बेरियम

संदर्भ: ‘इंडियन वर्चुअल हर्बेरियम’ (Indian Virtual Herbarium), देश की वनस्पतियों का सबसे बड़ा डेटाबेस है।

  • हाल ही में, भारतीय वनस्पति सर्वेक्षण (BSI) के वैज्ञानिकों द्वारा विकसित, ‘इंडियन वर्चुअल हर्बेरियम’ का उद्घाटन केंद्रीय पर्यावरण वन और जलवायु परिवर्तन मंत्री द्वारा किया गया।
  • ‘डिजिटल हर्बेरियम’ के प्रत्येक रिकॉर्ड में संरक्षित पौधे के नमूने की एक छवि, वैज्ञानिक नाम, संग्रह स्थान, संग्रह तिथि, संग्रहकर्ता का नाम और बारकोड संख्या शामिल है। डिजिटल हर्बेरियम में राज्य-वार डेटा निकालने की सुविधा भी शामिल हैं और उपयोगकर्ता अपने स्वयं के राज्यों के पौधों की खोज कर सकते हैं जो उन्हें क्षेत्रीय पौधों की पहचान करने और क्षेत्रीय चेकलिस्ट बनाने में मदद करेंगे।

अविवाहित महिलाएं गर्भपात सेवाओं का लाभ उठा सकती हैं: सुप्रीम कोर्ट

संदर्भ: (द हिंदू संपादकीय) पिछले हफ्ते सुप्रीम कोर्ट ने कहा था, कि MTP अधिनियम की पुनर्व्याख्या करते हुए कहा कि, क़ानून के नियमों में ‘पार्टनर’ का उल्लेख किया गया है न कि ‘पति’ का, और अविवाहित महिलाओं को विवाहित महिलाओं के बराबर रखा गया है।

पृष्ठभूमि: मेडिकल टर्मिनेशन ऑफ प्रेग्नेंसी एक्ट, 1971 और इसकी नियमावली, 2003 में 20 सप्ताह से 24 सप्ताह की गर्भवती अविवाहित महिलाओं को गर्भ समापन करने के लिए प्रतिबंधित किया गया है।

फैसले का महत्व:

  • निष्पक्षता: सुप्रीम कोर्ट ने एक नियम स्पष्ट किया है, कि यह प्रावधान स्पष्ट रूप से मनमाना और महिलाओं के ‘दैहिक स्वायत्तता और गरिमा’ के अधिकार का उल्लंघन करता है।
  • सुप्रीम कोर्ट ने सरकार से ‘कानून की दूरंदेशी व्याख्या’ करने की सिफारिश की है।
  • चमकदारउदाहरण के रूप में भारतीय न्यायपालिका: ऐसे समय में जब संयुक्त राज्य अमेरिका के सुप्रीम कोर्ट के हालिया फैसले में ‘रो बनाम वेड’ ने गर्भपात के सवाल पर उस देश को कई दशक पीछे खींच लिया है, भारतीय अदालत का यह कदम, अदालत के आधुनिक और प्रगतिशील होने की इच्छा का अच्छा उदाहरण है।
  • संविधान के अनुच्छेद 14 में सभी व्यक्तियों को कानून के समक्ष समानता और कानूनों के समान संरक्षण की गारंटी दी गयी है, जिसका अनुपालन किया जाना चाहिए।
  • पिछला मामला: सुप्रीम कोर्ट ने एक युवा अविवाहित महिला के गर्भपात (20 सप्ताह से अधिक) की सुविधा प्रदान की थी। इस महिला का साथी, उसके गर्भवती होने का पता चलते ही उससे अलग हो गया था।

 

विश्व आदिवासी दिवस 2022

9 अगस्त को विश्व के ‘आदिवासी लोगों के अंतर्राष्ट्रीय दिवस’ (World Tribal Day 2022) के रूप में मनाया जाता है।

  • उद्देश्य: मूलनिवासी लोगों की भूमिका और उनके अधिकारों, समुदायों और सदियों से एकत्रित और आगे बढाए गए ज्ञान को संरक्षित करने के महत्व को उजागर करने के लिए ‘विश्व आदिवासी दिवस’ मनाया जाता है।
  • थीम: “पारंपरिक ज्ञान के संरक्षण और प्रसारण में मूलनिवासी महिलाओं की भूमिका।”

इतिहास: वर्ष 1994 में, संयुक्त राष्ट्र महासभा (UNGA) ने एक प्रस्ताव पारित किया, जिसमें ‘9 अगस्त’ को विश्व के ‘मूलनिवासी लोगों के अंतर्राष्ट्रीय दिवस’ के रूप में घोषित किया गया था, क्योंकि, 9 अगस्त को मूलनिवासी / आदिवासी आबादी पर संयुक्त राष्ट्र कार्य समूह ने अपनी पहली बैठक आयोजित की थी।

महत्व:

  • आदिवासी लोगों द्वारा अर्जित ज्ञान का संज्ञान लेना सांस्कृतिक और वैज्ञानिक रूप से भी महत्वपूर्ण है
  • आदिवासी भाषाओं की समझ और संरक्षण, उनकी आध्यात्मिक प्रथाओं और दर्शन आदिवासियों की पहचान से समझौता किए बिना उनके संरक्षण और उत्थान में मदद कर सकते हैं।

भारत में जनजातियों की स्थिति: जनजातीय जनसंख्या कुल जनसंख्या का 8.6% (या 11 करोड़) है, जोकि दुनिया में किसी भी देश में जनजातीय लोगों की दूसरी सबसे बड़ी संख्या है। इनमें से 89.97% ग्रामीण क्षेत्रों में और 10.03% शहरी क्षेत्रों में रहते हैं।

  • लोकुर समिति (1965) के अनुसार, आदिम लक्षणों का संकेत, विशिष्ट संस्कृति, बड़े पैमाने पर समुदाय के साथ संपर्क की शर्म, भौगोलिक अलगाव, पिछड़ापन आदि, किसी समुदाय को अनुसूचित जनजाति के रूप में पहचानी जाने वाली आवश्यक विशेषताएं हैं।
  • संविधान: भारत का संविधान ‘जनजाति’ शब्द को परिभाषित नहीं करता है, हालांकि, अनुसूचित जनजाति शब्द को संविधान में अनुच्छेद 342 (i) के माध्यम से जोड़ा गया था।

ग्रेट बैरियर रीफ

संदर्भ: ऑस्ट्रेलियन इंस्टीट्यूट ऑफ मरीन साइंस (AIMS) की रिपोर्ट के अनुसार, ऑस्ट्रेलिया के ‘ग्रेट बैरियर रीफ’ (GBR) के उत्तरी और मध्य भागों में पिछले 36 वर्षों में ‘कोरल कवर’ का उच्चतम स्तर दर्ज किया गया है।

‘ग्रेट बैरियर रीफ’ के बारे में:

  • ‘ग्रेट बैरियर रीफ समुद्री उद्यान’ (Great Barrier Reef Marine Park), क्वींसलैंड (आस्ट्रेलिया) के उत्तरी-पूर्वी तट के समांतर 2,300 किमी से अधिक की लंबाई में फ़ैली हुई, विश्व की यह सबसे बड़ी मूँगे की दीवार है, और मोटे तौर पर ‘इटली’ के आकार के बराबर है।
  • इस उद्यान में लगभग 3,000 प्रवाल भित्तियां (coral reefs), 600 महाद्वीपीय द्वीप (continental islands), 1,625 प्रकार की मछलियां, 133 किस्मों की शार्क और रे मछलियाँ और 600 प्रकार के नरम और कठोर मूंगे (प्रवाल) पाए जाते हैं।
  • यह यूनेस्को द्वारा घोषित एक ‘विश्व धरोहर स्थल’ है।

परिभाषा: प्रवाल (Corals) समुद्री अकशेरूकीय जीव होते हैं जिनकी रीढ़ नहीं होती है (फाइलम निडारिया)। वे ग्रह पर पायी जाने वाली सबसे बड़ी जीवित संरचनाएं हैं।

प्रवाल भित्तियाँ (Coral Reefs) समुद्र में जैव विविधता के महत्वपूर्ण हॉटस्पॉट होती हैं। ‘प्रवाल’ (Corals), जेलीफ़िश और एनीमोन (Anemones) की भांति ‘नाइडेरिया’ (Cnidaria) वर्ग के जीव होते हैं। ये अलग-अलग पॉलीप्स से मिलकर बने होते हैं और एक साथ मिलकर ‘प्रवाल भित्ति’ का निर्माण करते हैं।

प्रवाल विरंजन’ क्या है?

जब तापमान, प्रकाश या पोषण में होने वाले किसी भी परिवर्तन के कारण प्रवालों पर तनाव बढ़ता है, तो वे अपने ऊतकों में निवास करने वाले ‘जूजैंथिली’ (Zooxanthellae) नामक सहजीवी शैवाल को निष्कासित कर देते हैं जिस कारण प्रवाल सफेद रंग में परिवर्तित हो जाते हैं। इस घटना को ‘कोरल ब्लीचिंग’ या ‘प्रवाल विरंजन’ (Coral bleaching) कहते हैं।

  • प्रवालों को अपनी लगभग 90% ऊर्जा, क्लोरोफिल और अन्य वर्णकों से भरपूर ‘जूजैंथिली’ शैवाल से प्राप्त होती है।
  • ये शैवाल, अपने पोषक प्रवालों के पीले या लाल भूरे रंग के लिए भी जिम्मेदार होते हैं। इसके अलावा, ‘जूजैंथिली’ जेलीफ़िश के साथ भी ‘अंतः सहजीवी’ / एंडोसिम्बियन्ट्स के रूप में भी रह सकते हैं।
  • किसी प्रवाल का विरंजन होने पर यह तत्काल नहीं मरता है, बल्कि मरने के काफी करीब आ जाता है। समुद्र की सतह का तापमान सामान्य स्तर पर लौटने के बाद कुछ प्रवाल इस अवस्था से बचे रह सकते हैं और पुनः स्वस्थ हो सकते हैं।

मूंगों का महत्व: प्रवाल भित्तियाँ, प्रजातियों की एक विस्तृत श्रृंखला का भरण पोषण करती हैं और तटीय जीवमंडल की गुणवत्ता को बनाए रखती हैं।

प्रवाल (मूंगे), मृत होने बाद ‘चूना पत्थर’ के खोल में परिवर्तित हो जाते हैं, और इस प्रकार पानी में कार्बन डाइऑक्साइड के स्तर को नियंत्रित करते हैं। यदि यह प्रक्रिया नहीं होती है, तो समुद्र के पानी में कार्बन डाइऑक्साइड की मात्रा में काफी वृद्धि होगी और परिणामस्वरूप ‘पारिस्थितिक आवासों’ (Ecological Niches) पर इसका प्रभाव पड़ेगा।